महेंद्रगढ़, मेरा पिछले 2 सालों से ज्यादा समय से अमेजन, फ्लिपकार्ट और डाक का पता। मैं महेंद्रगढ़ को अक्सर ठहरे हुए शहर के रूप में जानता हूं। यह कैसे मेरे जहन में आया होगा, आप महेंद्रगढ़ एक बार घूम जाएंगे तो आपको मालूम हो जाएगा। लगता है इस शहर को अपनी तरक्की के दिनों से इतनी मुहब्बत हुई कि दुनिया 21वीं सदी में आ गई और ये वहीं अटका रह गया। यहां 'ठहरना' महेंद्रगढ़ की तौहीन में लिखा कोई अल्फ़ाज़ नहीं है बल्कि यही ठहरना इस शहर की खूबसूरती भी है। यहां आज भी अधिकतर घर सौ साल पहले बनी उन मजबूत दीवारों पर ही टिके हैं, बस उन्हें अंदर बाहर से थोड़ा सा नयेपन से पोत दिया गया है। बड़ी बड़ी हवेलियां यूं ही पड़ी है। अगर मैं 1947 के ऊपर बन रही किसी फिल्म का डायरेक्टर होता तो सच में महेंद्रगढ़ को ही चुनता। यहां की गलियों, दुकानों और घरों से इस शहर के पुरानेपन के छापे मिटे नहीं हैं। शुरुआती दिनों में मेरे मन में आया कि इस ठहरे हुए शहर पर एक शानदार डॉक्युमेंट्री बनाई जाएं। इसके लिए इस शहर के पुराने- पुराने घरों की मैंने बहुत सारी तस्वीरें जुटा ली थी। इमारतों, गलियों और बाजार की तस्वीरें। पर शहर की तरह वह काम भी रुक गया। मुझ जैसे हेरिटेज प्रेमी आदमी के लिए तो यह शहर एक चाव की तरह था। शुरुआती दिनों में इस शहर का सम्मोहन मुझ पर खूब चला। मैं भरी दोपहरी में और रात को भी यूं ही इसकी बरसों पुरानी छोटी-छोटी गालियों, घरों और हवेलियों को देखने निकल जाया करता था। शहर के बीचों-बीच बने किले को मैंने पांच से छह बार देखा होगा। कोई भी मेरा परिचित मुझसे मिलने आता तो उसे किला दिखाने जरूर ले जाता। यह उसके लिए भले ही बोरिंग हों जाता होगा पर मेरे लिए मजा बराबर रहता था। मैं महेंद्रगढ़ में जहां रहता था, वहां सामने एक खूब बड़ी पुरानी हवेली थी; क्या ही सुंदर। अपनी जर्जरता में भी सुंदर। ऐसी बहुत-सी इमारतें वहां आस पास थी। एक बार मैंने एकांत में पढ़ने के लिए एक लाइब्रेरी में जाना शुरू किया। लाइब्रेरी पूरी की पूरी एक पुरानी हवेली थी। उसमें लीपा पोती करके, शीशे लगाकर विद्यार्थियों के रहने के लिए एक पीजी भी बना दिया गया था। पर मेरे लिए उसका सौंदर्य वही पुराना नौहरा, मोटी मोटी दीवारें और छोटे छोटे कमरे थे। कोई मेरे मन-मस्तिष्क में झांककर यदि कोई कह दे कि मैं इस लाइब्रेरी में इस लिए आता था कि यह एक हवेली में बनी है तो मुझे अचरज न होगा। इस शहर की विचित्रताओं में एक है यहां की मिठाई की दुकानें। संख्या में इतनी ही यहां बाकी सब दुकानें है, इतनी ही मिठाई की। रसगुल्ला और मावा यहां के ग्राहक जन का प्रिय खाद्य पदार्थ है। और सच में इन दोनों ही मिठाई में यहां की पुरानी दुकानों का कोई तोड़ नहीं है। एकदम लाजवाब, खैर छोड़िए, क्यों ही आपके मुंह में पानी लाना। एक मिठाई रह गई, वो है जलेबी। टोपीवाले की जलेबी। वो भी एक ही नाम की तीन दुकानें, एक साथ। इस शहर की एक और विचित्र बात है, जरा वो भी सुनिए। मैं दिल्ली रहकर आया तो देर से सोने का आदी हो गया था। कोई बोलता कि भाई कब तक जागोगे तो कहता कि अभी तो रात जवान है। पर महेंद्रगढ ने मुझे इस बात कर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य कर दिया। यहां का बाजार 7 बजे ही एकाएक से बंद हो जाता है और 10 बजे तक तो आधे शहरवासी मध्यनिद्रा में होते हैं। रात को 11 बजे आपको रेलवे स्टेशन के पास चाय वाले खोके और आधी खिड़की खुले दारू वाले ठेके के अलावा, बस आवारा कुत्ते, सांड और शराबी ही किस्मत/बाद किस्मत से मिल सकते हैं। ठहरना इस शहर की खूबसूरती के साथ साथ बदनियती भी है। मेरे जीवन में महेंद्रगढ़ वाइल्डकार्ड एंट्री की तरह आया था। अभी भी इस शहर का दाना पानी जारी है, और कब तक और रहेगा, बताना जरा मुश्किल है। कुछ दिनों पहले मैं बड़ा त्रस्त हो गया, मैनें सोशल मीडिया पर लिख दिया – “ जिंदगी महेंद्रगढ़ हो गई है, कोई विकास ही नहीं हो रहा।” मेरे परिचित महेंद्रगढ़ वासी रूष्ट हुए पर मैं संतुष्ट हुआ। और इस शहर की जो सबसे बड़ी विचित्रता है, वह इसके रुकने में ही है, वो कैसे? अगली कड़ी में आपको बताता हूं….
अंधेरा है, शांति है, सब सो रहे हैं। पर अभी भी कहीं अस्थिरता है, मन में कोई खाली जगह है। अंतर्मन के किसी कमरे के दरवाजे अभी भी खुले हैं, जहां से हवा साँय- साँय करके गुजर रही है। जिसकी गूंज मेरे अंदर बनी हुई है। जो इस शांति में भी मुझे अस्थिर रखती है। इतने जतन के बाद भी हम यूं ही जीवन की नीरसता से टकरा जाते हैं। जीवन की नीरसता में भी शायद कोई रस है। तभी तो हम चाहते , न चाहते हुए भी बार - बार इसकी गिरफ्त में आ जाते हैं। ऐसा नहीं है कि किसी घटना से नीरसता उपजती है, इसके लिए किस स्थाई भाव, विभाव, अनुभाव की कतई जरूरत नहीं है, नीरसता रसों की अति होने से भी उपज जाती है, या राह चलते मेरे बाप की उम्र के किसी अधेड़ आदमी को कोई ठेला घसीटे या थक कर टूट चुके पांवों को साइकिल की पैडल पर जोर लगाते देखता हूं तो मेरे अंदर उपजती है दया और उस दया के साथ आती है जीवन की नीरसता। मेरी यह नीरसता मुझे मौन देती है और मेरे अंदर मर चुकी सृजनता को सांसे। मैं इसका इस्तेमाल किसी वैक्सीन की तरह करता हूं। खैर छोड़िए, नीरसता जीवन के लिए बहुत काम की चीज है, आज के इस सरपट संसार में नीरसता का बोध होना ही ब...
बेहद सुंदर वर्णन मित्र 🤩🥳🎉💐💐
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर सर
जवाब देंहटाएंRobin bhai,,, kya likh diya h...pran dal diya apne pathar chune k Shahar me... मने ye pd jrur h pr Esa lga jaise ap samne baithe mihjubani suna rhe ho....धन्यवाद
जवाब देंहटाएंमहेंद्रगढ़ का इतना सुंदर वर्णन मैने आज तक नहीं सुना । आपने क्या लिखा है एक अलग ही एहसास इसको पढ़ कर लगा । कभी नारनौल शहर भी घूमिए और अपनी लेखनी से उस शहर की सुंदरता उसकी पुरानी दास्तान को रूबरू कराइए ।
जवाब देंहटाएंबहुत खूब
जवाब देंहटाएंसुंदर और यथार्थवादी चित्रण
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर भाई ❤️❤️
जवाब देंहटाएंबहुत खूब लिखा है रॉबिन
जवाब देंहटाएंअद्भुत लेख रोबिन भाई 👍
जवाब देंहटाएंबहुत खूब भाई 🫀
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