सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

नीरसता

अंधेरा है, शांति है, सब सो रहे हैं। पर अभी भी कहीं अस्थिरता है, मन में कोई खाली जगह है। अंतर्मन के किसी कमरे के दरवाजे अभी भी खुले हैं, जहां से हवा साँय- साँय करके गुजर रही है। जिसकी गूंज मेरे अंदर बनी हुई है। जो इस शांति में भी मुझे अस्थिर रखती है। 

इतने जतन के बाद भी हम यूं ही जीवन की नीरसता से टकरा जाते हैं। 

जीवन की नीरसता में भी शायद कोई रस है। तभी तो हम चाहते , न चाहते हुए भी बार - बार इसकी गिरफ्त में आ जाते हैं। 


ऐसा नहीं है कि किसी घटना से नीरसता उपजती है, इसके लिए किस स्थाई भाव, विभाव, अनुभाव की कतई जरूरत नहीं है, नीरसता रसों की अति होने से भी उपज जाती है, या राह चलते मेरे बाप की उम्र के किसी अधेड़ आदमी को कोई ठेला घसीटे या थक कर टूट चुके पांवों को साइकिल की पैडल पर जोर लगाते देखता हूं तो मेरे अंदर उपजती है दया और उस दया के साथ आती है जीवन की नीरसता। मेरी यह नीरसता मुझे मौन देती है और मेरे अंदर मर चुकी सृजनता को सांसे। मैं इसका इस्तेमाल किसी वैक्सीन की तरह करता हूं। खैर छोड़िए, नीरसता जीवन के लिए बहुत काम की चीज है, आज के इस सरपट संसार में नीरसता का बोध होना ही बड़ी चीज है। मुझे मिल जाती है, आप भी संसार की रसलीनता से परे होकर कभी कभी नीरसता ढूंढा कीजिए। नीरसता को भले ही भरत मुनि ने नवरसों में जगह नही दी पर ध्यान रहे  इस नीरसता ने ही सिद्धार्थ को बुद्ध बनाया। 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

ठहरा हुआ शहर - 1

महेंद्रगढ़ , मेरा पिछले 2 सालों से ज्यादा समय से अमेजन , फ्लिपकार्ट और डाक का पता । मैं महेंद्रगढ़ को अक्सर ठहरे हुए शहर के रूप में जानता हूं । यह कैसे मेरे जहन में आया होगा , आप महेंद्रगढ़ एक बार घूम जाएंगे तो आपको मालूम हो जाएगा । लगता है इस शहर को अपनी तरक्की के दिनों से इतनी मुहब्बत हुई कि दुनिया 21 वीं सदी में आ गई और  ये  वहीं अटका रह गया । यहां ' ठहरना ' महेंद्रगढ़ की तौहीन में लिखा कोई अल्फ़ाज़ नहीं है बल्कि यही ठहरना इस शहर की खूबसूरती भी है । यहां आज भी अधिकतर घर सौ साल पहले बनी उन मजबूत दीवारों पर ही टिके हैं , बस उन्हें अंदर बाहर से थोड़ा सा नयेपन से पोत दिया गया है । बड़ी बड़ी हवेलियां यूं ही पड़ी है । अगर मैं 1947 के ऊपर बन रही किसी फिल्म का डायरेक्टर होता तो सच में महेंद्रगढ़ को ही चुनता । यहां की गलियों , दुकानों और घरों से इस शहर के पुरानेपन के छापे मिटे नहीं हैं । शुरुआती दिनों में मेरे मन में आया कि इस ठहरे हुए शहर प...

यादों के खंडहर (पहला भाग)

 "कुछ चंद कदम ही चला था मैं अभी उस खंडहर से की एक अतरंगी सी आवाज मेरे कानों से टकराती है, मैं अचानक मुड़ के पीछे देखता हूं तो सब का सब जो मेरे और उस खंडहर के बीच का जुड़ाव का कारण था, जिंदा हो उठता है। एक छोटे क्षण से लेकर छोटी बड़ी तमाम तरह की घटनाएं, अनायास ही मेरे सामने आ धमकती है। मैं ऐसे उनमें विलीन हो जाता हूं की मानो उनको ही जी रहा हूं , और यह भूल जाता हूं की मैंने पहले इनको जिया हुआ है। मैं उन बीतें दिनों का रस पीता ही होता हूं की मुझे स्मरण हो आता है की ये सब स्मृतियां है। सब सम्मोहन धरे का धरा रह जाता है। खंडहर फिर से खंडहर बन जाता है जो एक वक्त हरा गुलिस्तां बन गया था। " .....