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नीरसता

अंधेरा है, शांति है, सब सो रहे हैं। पर अभी भी कहीं अस्थिरता है, मन में कोई खाली जगह है। अंतर्मन के किसी कमरे के दरवाजे अभी भी खुले हैं, जहां से हवा साँय- साँय करके गुजर रही है। जिसकी गूंज मेरे अंदर बनी हुई है। जो इस शांति में भी मुझे अस्थिर रखती है।  इतने जतन के बाद भी हम यूं ही जीवन की नीरसता से टकरा जाते हैं।  जीवन की नीरसता में भी शायद कोई रस है। तभी तो हम चाहते , न चाहते हुए भी बार - बार इसकी गिरफ्त में आ जाते हैं।  ऐसा नहीं है कि किसी घटना से नीरसता उपजती है, इसके लिए किस स्थाई भाव, विभाव, अनुभाव की कतई जरूरत नहीं है, नीरसता रसों की अति होने से भी उपज जाती है, या राह चलते मेरे बाप की उम्र के किसी अधेड़ आदमी को कोई ठेला घसीटे या थक कर टूट चुके पांवों को साइकिल की पैडल पर जोर लगाते देखता हूं तो मेरे अंदर उपजती है दया और उस दया के साथ आती है जीवन की नीरसता। मेरी यह नीरसता मुझे मौन देती है और मेरे अंदर मर चुकी सृजनता को सांसे। मैं इसका इस्तेमाल किसी वैक्सीन की तरह करता हूं। खैर छोड़िए, नीरसता जीवन के लिए बहुत काम की चीज है, आज के इस सरपट संसार में नीरसता का बोध होना ही ब...