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यादों के खंडहर (पहला भाग)

 "कुछ चंद कदम ही चला था मैं अभी उस खंडहर से की एक अतरंगी सी आवाज मेरे कानों से टकराती है, मैं अचानक मुड़ के पीछे देखता हूं तो सब का सब जो मेरे और उस खंडहर के बीच का जुड़ाव का कारण था, जिंदा हो उठता है। एक छोटे क्षण से लेकर छोटी बड़ी तमाम तरह की घटनाएं, अनायास ही मेरे सामने आ धमकती है। मैं ऐसे उनमें विलीन हो जाता हूं की मानो उनको ही जी रहा हूं , और यह भूल जाता हूं की मैंने पहले इनको जिया हुआ है। मैं उन बीतें दिनों का रस पीता ही होता हूं की मुझे स्मरण हो आता है की ये सब स्मृतियां है। सब सम्मोहन धरे का धरा रह जाता है। खंडहर फिर से खंडहर बन जाता है जो एक वक्त हरा गुलिस्तां बन गया था। " .....

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नीरसता

अंधेरा है, शांति है, सब सो रहे हैं। पर अभी भी कहीं अस्थिरता है, मन में कोई खाली जगह है। अंतर्मन के किसी कमरे के दरवाजे अभी भी खुले हैं, जहां से हवा साँय- साँय करके गुजर रही है। जिसकी गूंज मेरे अंदर बनी हुई है। जो इस शांति में भी मुझे अस्थिर रखती है।  इतने जतन के बाद भी हम यूं ही जीवन की नीरसता से टकरा जाते हैं।  जीवन की नीरसता में भी शायद कोई रस है। तभी तो हम चाहते , न चाहते हुए भी बार - बार इसकी गिरफ्त में आ जाते हैं।  ऐसा नहीं है कि किसी घटना से नीरसता उपजती है, इसके लिए किस स्थाई भाव, विभाव, अनुभाव की कतई जरूरत नहीं है, नीरसता रसों की अति होने से भी उपज जाती है, या राह चलते मेरे बाप की उम्र के किसी अधेड़ आदमी को कोई ठेला घसीटे या थक कर टूट चुके पांवों को साइकिल की पैडल पर जोर लगाते देखता हूं तो मेरे अंदर उपजती है दया और उस दया के साथ आती है जीवन की नीरसता। मेरी यह नीरसता मुझे मौन देती है और मेरे अंदर मर चुकी सृजनता को सांसे। मैं इसका इस्तेमाल किसी वैक्सीन की तरह करता हूं। खैर छोड़िए, नीरसता जीवन के लिए बहुत काम की चीज है, आज के इस सरपट संसार में नीरसता का बोध होना ही ब...

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