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खंडहर बोल रहे है

‘धोलावीरा’ यूनेस्को द्वारा वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल किया गया। कच्छ का यह शहर अपनी जवानी के दिनों में कभी क्या खूब रहा होगा। यहां की हर ईंट ने देखा होगा एक मासूम बच्चे की तरह इस शहर का बसना और उजड़ जाना। यहां का हर पत्थर, हर ईंट एक अद्भुत अहसास है, आदि से लेकर के अब तक की यात्रा का। 

स्कूल की किताबों में कभी पढ़ा था की धोलावीरा, राखीगढ़ी, हड़प्पा, कालीबंगा, लोथल आदि सिंधु सभ्यता के मुख्य स्थल रहें है। कभी इन्ही शहरों के इर्द गिर्द एक जीती जागती दुनिया रही होगी। इन खंडहरों में बीचों बीच कभी हमारे जैसे ही इंसान रहते होंगे, हमारी तरह के मन, मस्तिष्क, भावनाओ वाले। उनके अंदर भी अपनी दुनिया को बहुत दूर तक ले जाने की सोच रही होगी। जो आज प्रकृति के थपेड़ों से बच बचाकर हमारे अंदर भी किसी न किसी तरह से विद्यमान है।  हमारी आज की दुनिया से वह कितनी साम्य या अलग रही होगी, मालूम नही; पर इतना तो तय है की हमारी आज की सभ्यता का आधार रही होगी।  

बचपन से ही ऐसी पुरानी चीजों, पुराने शहरों, खंडहरों के प्रति एक अलग तरह का ही लगाव था। एक बार तो सोच ही लिया था की भारतीय पुरातत्व विभाग में ही कुछ ना कुछ काम करूंगा; इसी बहाने इतिहास की बची हुई इन निशानियों के करीब रह सकूंगा। आज भी जहां कहीं भी होता हूं वहां के पुरानी ऐतिहासिक महत्व के स्थलों को देखने निकल जाया करता हूं। घंटो उन्हे समझने के प्रयत्न करते रहता हूं। स्कूल में पढ़ते कभी सोचा नहीं था की जिन्हें हम केवल परीक्षा में आने वाला प्रशोत्तर समझ रहे है, वो पूरा का पूरा इंसानी सभ्यता का इतिहास है। हमारे पुरखों की अमिट निशानियां है। जो अब तक बचे रहकर कह रही हों कि देखो तुमसे पहले यहां तुम्हारे जैसे ना जाने कितने होकर के जा चुके है। इतिहास और समय दोनों कभी न खत्म होने वाली चीजें मालूम होती है। इतिहास अपने बनने की प्रक्रिया में न जाने कितने ही इंसानी सभ्यताओं को खर्च कर चुका होगा। 
राखीगढ़ी हमारे यहां से कुछ 60 किलोमीटर की दूरी पर ही है, बहुत बार मन किया की वहां जाया जाए और उन पत्थरों के स्पर्श द्वारा उन जिंदगियों को जो वहां गुजर चुकी है अनुभव किया जाए। पर अभी तक संभव ना हो पाया। कॉलेज में इतिहास विषय  के कुछ दोस्तों के साथ वहां जाने को लेकर ना जाने कितनी बार बातचीत हुई। एक बार तो एक मित्र से बात करके वहां के लिए घर से निकल ही गया था, अग्रोहा (एक अन्य ऐतिहासिक व धार्मिक स्थल) और राखीगढ़ी दो जगह जाने के लिए ही यात्रा का संयोजन हुआ। अग्रोहा के एक दो प्राचीन मंदिर तो देख पाया मगर कोरोना और कुछ अन्य कारणवश राखीगढ़ी से तो दूर से ही मलाल भरी निगाह लेकर वापिस आना पड़ा। सरकार द्वारा अभी वहां एक संग्रहालय निर्माणधीन है, तो जल्द ही उसके बनते  वहां जाना हो सकता है। ऐसी जगहों पर जहां जाना हो पाया है उनकी बाते आगे...


तस्वीरें @vijayrupani के फेसबुक पन्ने से

टिप्पणियाँ

  1. बहुत सुंदर लिखा है और बहुत अच्छे से प्रस्तुत भी किया है।

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  2. अतीत मारता नही कभी वो लोट आता है जब जब हम उसक एहसास करते है । बहुत खूब

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  3. बहुत सुंदर 🌸

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